निन्दक नियरे राखिये, आंगन कुटी छवाय। बिन पानी-साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय।।


आलोचना या आलोचक दो तरह के होते है। एक वह जो आप से नफरत/घृणा/जलन करते हैं और दुसरे वो जो आप के शुभचिंतक होते हैैं। 
पहली तरह वाले आप को हर तरह से नीचा दिखाना चाहते है और दूसरी तरह वाले की आलोचना में आलोचना कम सलाह ज्यादा होती है। 
सुधार की गुन्जायिस हर समय और हर व्यक्ति और हर संगठन में बनी रहती है, चाहे वह शिखर पर ही क्यों न पहुच गया हो या फिर शिखर से जमीन पर आ गया हो। हमें दूसरी तरह के आलोचना का हमेशा स्वागत करना चाहिए। हम अपने आलोचकों की बात माने या न माने पर सुनना जरुर चाहिए बल्कि हमें आलोचक पाल कर रखना चाहिए। जो दूसरी तरह के आलोचना को नहीं सुनना पसंद करते, उनको गलती हो जाने के बाद गलती का पता चलता है फिर करेक्टिव इस्टेप लेने का चांस नहीं बचता है। जबकि सही समय पर कमी/गलती का पता चलने पर हम करेक्टिव स्टेप ले सकते है।
..इसलिए ही कबीरदास जी ने यह दोहा कहा था कि
.....निन्दक नियरे राखिये, आंगन कुटी छवाय, 
बिन पानी-साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय …
समर्पित कार्यकर्ताओ को इग्नोर कर या उनको बाहर निकल कर चाटुकार लोगो की टीम जो आप के गलत एक्सन को भी आँख मूंद कर सही करार दे और हमेशा आप को मुद्दे के गुणदोष के आधार पर सलाह न देकर आपको खुश करने के लिए चापलूसी पूर्ण सलाह दे, ऐसे कार्यकर्ताओ को साथ लेकर आप ज्यादा दिन आगे नहीं जा सकते...
रमाशंकर जी
जय भारत - जय संबिधान