*मोमबत्तियों से इतर कुछ !*

 


पटना में हमारे कॉलोनी की सुबहें अब मंदिर की घंटियों और मस्ज़िद की अज़ान से नहीं, सफाईकर्मियों के खूबसूरत थीम सांग *'गाड़ी वाला आया घर से कचरा निकाल'* से शुरू होती है। बालकनी में बैठकर देर तक उन्हें निहारता रहता हूं। लोग घरों से कचरा नहीं निकालते तो वे आवाज़ देकर भी मांग लेते हैं। इस संकट काल में सफाईकर्मियों की कर्तव्यनिष्ठता देखकर मन भावुक हो जाता हैं। दिन चढ़ने के साथ सड़कों पर चेहरे पर मास्क डाले पुलिसकर्मियों की आवाजाही आश्वस्त करती हैं। डॉक्टर और स्वास्थ्यकर्मी मित्रों से बातें करता हूं तो यह सोचकर श्रद्धा से सिर झुक जाता है कि कैसी-कैसी खतरनाक स्थितियों में ये लोग हमें अपनी सेवाएं दे रहे हैं। ये ही लोग हमारे सच्चे फरिश्ते और देवदूत हैं।कल लखनऊ सहित कुछ शहरों में नागरिकों द्वारा अपनी छतों से इन लोगों पर फूल बरसाने के दृश्य देखकर आंखें भर आईं। दुख होता है यह देखकर कि इन सबको न्यूनतम सुरक्षा सुविधाओं के साथ जानलेवा परिस्थितियों में काम करना पड़ रहा है। अभी तक अपने ज्यादातर स्वास्थ्यकर्मियों को हम व्यक्तिगत सुरक्षा किट उपलब्ध नहीं करा पाए हैं। व्यक्तिगत सुरक्षा किट की ज़रूरत हमारे सफाईकर्मियों और पुलिस वालों को भी है। ये सभी लोग स्वस्थ और सुरक्षित रहेंगे तो हम भी स्वस्थ और सुरक्षित रहेंगे।


लॉकडाउन में देश-दुनिया से आ रही बड़ी संख्या में मौत की खबरों के बीच अपने घरों में बंद हमलोगों ने कुछ दिनों पहले तालियां बजाई थी। हम मोमबत्ती और दीये भी जला देंगे।सवाल बस इतना है कि *कोरोना के ख़िलाफ़ निर्णायक लड़ाई में हमारी भूमिका ताली बजाने और मोमबत्ती जलाने तक ही सीमित तो नहीं रह जाने वाली है ?*


-ध्रुव गुप्त (आईपीएस)