चरमराई अर्थ ब्‍यवस्‍था में दूभर हुआ जीवन : शिवाकान्‍त तिवारी


भारतीय अर्थव्यवस्था में मुद्रा चलन की कमी से रोजगार का सृजन में होगो कमी। देश की अर्थव्यवस्था की बात की जाय तो कारोना वायरस ने देश की हालत खराब कर दी  है जहां  मजदुर बड़े शहरो से पलायन कर रहे है वही कई फैक्ट्री बंद होने की कगार पर है मुद्रा चलन की बात की जाय तो लाक डाउन ने प्रभावित कर दिया है पैसे की कमी ने आम जनता को झकझोर दिया है। व्यवसाय पूर्ण रुप से प्रभावित हो चुका है बाजार की गती धिमी पड़ गई है ज़िससे मुद्रा चलन  में  गिरावट आ गयी है पैसे की कमी ने लोगो का जीवन को बदल कर रख दिया है जो कभी मस्ती में फिजुल खर्ची किया करते थे पार्टी मनाते थे आज उन लोगो ने भी अपने हाथों को पूरी तरह सिकोड़ रखा है दुकानो पर शापिंग माल मे स्कुल मे या छोटे उद्दोग मे काम करने वाले लोग को सेलरी मिलनी भी बंद हो चुकी हैं दुकान व मकान के किराये से जीने वाले बड़े शहरो मे लोग भी ईस माहमारी मे आर्थिक रुप से परेसान दिख रहे है कारोना ने विश्व स्तर पर जीवन गाथा को रोक दिया है एक तरफ लोग कारोना से डरे है वही दुसरी तरफ अर्थव्यवस्था की कमजोरी ने मनुष्य को बदल कर रख दिया है गांव मे रहने वाले लोगो की बात करे तो  यह  दिख रहा है की खेती पर आधारित जीवन पशुपालन से अपनी जीविका चलाने मे माहीर है शहर का जीवन मनुष्य के लिये दुखदायी हो गया है। लाक डाउन ने देश  को  20 वर्ष  पिछे की तरफ कर दिया है जिसे  सही करने मे अब एक बड़ा वक्त  लगेगा।  समाज की बात करे तो सबसे अधिक संख्या मध्यम वर्ग के लोग परेसान है क्योकी उनका जीवन व्यवसाय पर या प्राईवेट नोंकरी पर आधारित है। गुरुकुल वाणी से  शिवाकांत तिवारी की  रिपोर्ट  भारतीय अर्थव्यवस्था पर आधारित जीवन की शैली पर।