♨♨केहू नईखे बोलत बा♨♨

 




         ❗❗❗अजय पाण्‍डेय❗❗❗❗❗❗❗


काल चक्र ई अइसन सबके, चढ़ल कपारे डोलत बा। 
बड़का भइया शहर से अइलन, केहू नईखे बोलत बा।।


बॉम्बे जइसन शहर में उनकर,
 चढ़ल   जवानी   बीत   गइल,
उनहीं   के  पैसा   से    हमरे,  
घर  कै  पक्की   भीत   भइल,
लमवैं से अब छोटका बड़का, सबही मेथी छोलत बा।
बड़का भइया शहर से अइलन, केहू नईखे बोलत बा।।


पांव में छाला पड़ल बा उनके, 
अखिया   जइसे   जागल   बा,
बांम्बे    से   पैदल   अइले  में , 
सोरह   दिनवां     लागल   बा,
बड़े प्यार से बोलत बाड़े , मुंहवां केहु ना खोलत बा।
बड़का भइया शहर से अइलन, केहू नईखे बोलत बा।।


बड़की भउजी  मुहां तोपि के, 
कलुआ के समझावति बाड़ी,
अबहिन पजरे  मत जाइहे तै, 
ओके आंखि देखावति  बाड़ी,
अइसन पापी हवे कोरोना, रिश्ता में विष घोलत बा।
बड़का भइया शहर से अइलन, केहू नईखे बोलत बा।।


टिबुले वाली  मडई  में अब,  
भइया     कै   चरपाई    बा,
मस मांछी के छोड़ि उहाँ ना, 
केहु   कै    आवा जाही   बा,
कहैं "लाल" ई मनवां हमरा भितरैं भीतर खउलत बा।
बड़का भइया शहर से अइलन, केहू नईखे बोलत बा।।