कविता

यलगार करो, यलगार करो,
अरि शिलाखंड पे वार करो।
मां काली को आहूत करो,
संहार करो, संहार करो।


कुत्तों की संख्या बढ़ जाए
तो शेरों पर भी झपटेंगे
तुम हाथ जोड़कर खड़े रहो
वो आंख दिखाकर डपटेंगे
मत गाओ राग अहिंसा का 
अब हिंसा का प्रतिकार करो
मां काली को आहूत करो,
संहार करो, संहार करो।


दुष्टों के भेद नहीं होते,
पातक का माप नहीं होता,
बैरी का त्रास मिटाने में,
हत्या का पाप नही होता,
तुम बाहुबल्य के द्योतक हो
है सत्य इसे स्वीकार करो।
मां काली को आहूत करो,
संहार करो, संहार करो।


कांटों की वेदी पर चढ़कर,
तब मस्तक मुकुट सजाये हैं,
इस पावन धरा की रक्षा में,
बहुतों ने शीश कटाए हैं।
तुम कुरुक्षेत्र के अर्जुन हो,
निज धन्वा की टंकार करो।
मां काली को आहूत करो,
संहार करो, संहार करो।


मुट्ठीभर चूहे कबसे,
छाती पर चढ़कर नाच रहे,
वो तलवारों के मानी हैं
तुम व्यर्थ किताबें बांच रहे,
हे महासमर के महावीर
अब युद्धनीति व्यवहार करो
मां काली को आहूत करो,
संहार करो, संहार करो।



सत्यदीप त्रिवेदी